Monday, 6 October 2014

स्वर्ग से सुन्दर

स्वर्ग से सुन्दर
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विश्व धरा देखता
मधुकर मन
खिलखिलाते हुए
वन और उपवन

पत्तियों को छूकर
सहलाती पवन
साथ फूलों की खुशबू
ले आती पवन

पाप धोती गंगा
स्वयं है पावन
बढ़ रही वो करने
सिंधु से मिलन

धरा ओढती स्वयं
रंग बिरंगी चुनर
एकटक देखता है
दूर से गगन

क्यों चाह हो हमें बनाना
चाँद पर महल
जब धरा ही है स्वयं
स्वर्ग से सुन्दर
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© copyright Kiran singh

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