क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ
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नित्य उठ भोर राम भैरवी
तेरे वाद्य संग मैं गा लूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ
बड़ी तपन है जेठ दोपहरी
मैं तुम छांव तले बतिया लूँ
क्यों न तुझे मैं विषय बना लूँ
शाम सिंदूरी साज सजी है
तेरे गीतों को मैं गा लूँ
क्यों न तुझे मैं विषय बना लूँ
पलक मूद निशा मध्य
नयनों में तेरा स्वप्न सजा लूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ
चाँद प्रहरी प्रेम साक्षी
मैं तुम मिल एक रीति बना लूँ
क्यों नतुझे ही विषय बना लूँ
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© copyright Kiran singh
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