विश्व धरा
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विश्व धरा देखता
मधुकर मन
खिल रहे हैं पुष्प गगन
बरस रहा आंगन
ओढकर दूल्हन धरा
रंग बिरंगी चुनर
विजयी मुद्रा सुन्दरी सी
ज्यों स्वर्ग से सुन्दर
अमॄत कलश लिए गंगा
बह रही निर्झर
कर कल कल छल छल
बढ़ रही निरन्तर
जो धो रही थी पाप
उसे शापित किए हो तुम
जो स्वच्छ पावन थी
उसे दूषित किए हो तुम
संतान कैसे हो तुझे
संवेदना नहीं है क्या
पीर सहकर चुप रही तो
उसे वेदना नहीं है क्या
काटकर वन उपवन
निर्जीव हो किए
सुन्दरी प्रकृति चुप है
अश्रु को पिए
प्रकृति के प्रकोप से
प्रलय न हो जाए कहीं
मत करो अत्याचार तुम
नर हो पिशाच नहीं
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© copyright Kiran singh
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