!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! सीख लिया !!!!!!!!!!!!!!!!!!!
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मर - मर कर ही जिंदगी ने , मरकर जीना सीख लिया
लगा पाँव में ठोकर तब से , स्वयं सम्हला सीख लिया
मॄगतृष्णा में भटक-भटक कर , भाग रहे हैं लोग यहाँ
सोच रहा है चातक पंक्षी , बूंद स्वाति की मिले कहाँ
छलकर विजयी झूठ हो रहा , टूट रहा सच का दर्पण
लोग मुखौटा लिए लगाए , बदल रहे देखो क्षण - क्षण
जड़ें जमाकर भ्रष्टाचार की , लगता है आचार बनी
इसीलिये तो आज हमारी , माँ बहनें लाचार बनी
किस - किस को कोसोगे बोलो क्या बोलोगे चोरों को
जब लोग प्रलोभन स्वयं दे रहे , लोभी रिश्वतखोरों को
सीधेसादे लोगों ने भी , छलप्रपंच जो सीख लिया
मार स्वयं ही मानवता को, दानव से तारीख लिया
© किरण सिंह
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