Friday, 29 August 2014

कितना प्रेम था

!!!कितना प्रेम था !!!

कितना प्रेम था उसे रंगों से
माथे पर रंग बिरंगी
बिंदियां
चांद सितारों से
भरा मांग
और
हथेलियों पर मेहदी रचाकर
जिसपर
छपा था पिया का नाम
खनकाती हरी 
चुडियाँ
और
छमकाती पायल आती थी वो
सतरंगी चुनर
ओढे
व्रत उपवास भी रखती थी
अखंड सौभाग्य
के लिए
मंदिर मंदिर दिये भी
जलाती थी
पर
नियति का क्रूर चक्र
आह
कितनी बदल गई थी वो
तन पर श्वेत वस्त्र
शान्त निरीह
आँखों में थे उसके अनेकों
प्रश्न
जब बड़ी प्रेम से गई थी वो
हल्दी के रस्म में
और सास ने कहा
रुको
सिर्फ सुहागिनों के लिए है
यह रस्म
क्यों
क्रूर रीतियँ सिर्फ
स्त्रियों के लिए
ही हैं ......?.........................किरण सिंह

Wednesday, 27 August 2014

बारिश की बूँदें

!!!बारिश की बूँदें !!!

बारिश की बूंदो
और बेटियों में कितनी समानता है
वो भी तो बिदा होकर
बादलों को छोड़ चल पड़ती हैं
नैहर से
सिंचित करने पिया का  घर
बेटियों की
तरह

अपने पलकों में स्वप्न सजाकर
सुन्दर और सुखद
उनका भी
भयभीत मन सोंचता होगा
कैसा होगा पीघर
डरता होगा
बेटियों की
तरह

मिले सीप सा अगर पिया का घर
ले लेती हैं बूंदें आकार
मोतियों का
और
इठलाती हैं अपने भाग्य पर
बेटियों की
तरह

पर यदि
दुर्भाग्य से कहीं
गिरती हैं नालों में
खत्म हो जाता उनका भी अस्तित्व
फिर वो भी
रोतीं होंगी अपने भाग्य पर
बेटियों की
तरह......................किरण सिंह

मुझे गर्व है

!!!!मुझे गर्व है !!!!

मुझे गर्व है
अपनी समॄद्ध संस्कृति ,सभ्यता
एवं रिती रिवाजों पर
किन्तु
जब परंपराओं में बांधकर
धनधान्य के साथ
पिता ने जब किया था
मेरा दान
तब
निकल आए थे नेत्रों से मेरे प्राण
पिघल कर
पूछना चाहते थे रूंधे
स्वर
क्या गुनाह करती हैं
बेटियाँ
कि कर दिया जाता है
कन्या दान
तब याद आया दादी का वो
कथन
कि क्यों कहती थीं
वो
कि बेटियों होती हैं पराया
धन
..................................
         किरण सिंह

Tuesday, 26 August 2014

आसमान चाहिए

!!!मैं समझती हूँ !!!

मैं समझती हूँ
तुम्हारे भावनाओं को
तब से
जब तुमने पूर्ण विस्वास के साथ
मुझे सौप दिया था
अपना घर ,परिवार और
मैं
साम्राज्ञी बन बैठी
तुम्हारे सुन्दर साम्राज्य की
तुम्हारे हर निर्णय में
मेरा विमर्श
मेरे तुम्हारे मध्य गहरी मित्रता का
प्रमाण
और तुम्हारे परिवार का
बेटी ,बहन सा
दुलार
फिर कैसे न करती मैं अपना सर्वस्व
समर्पण
भूल गई मैं तुम्हारे प्रेम में अपना
अस्तित्व
और निखरता गया मेरा
स्त्रित्व
खुश हूँ आज भी
पर
ना जाने क्यों
लेखनी के पंख से उड़ना चाहती हूँ
मुझे मत रोको
मुझे
स्वर्ण भूषण नहीं
आसमान चाहिए
.......................................
©copyright Kiran singh          

Monday, 25 August 2014

गृह लक्ष्मी हूँ

!!!गृह लक्ष्मी हूँ !!!

गृह लक्ष्मी हूँ
गृह स्वामिनी हूँ
साम्राज्ञी हूँ  और
अपने सुखी संसार में
खुश भी हूँ
फिर भी
असंतुष्ट हूँ स्वयं से
बार बार
झकझोरती अंतरात्मा
मुझसे पूछती है
क्या
घर परिवार तक ही
सीमित है तेरा जीवन  ?
कहती है
तुम
ॠणी हो पॄथ्वी , प्रकृति
और समाज की
और तब
हॄदय की वेदना शब्दों में बंधकर
छलक आती है
अश्रुओं की तरह सस्वर
फिर
चल पड़ती है लेखनी
आवरण उतार
लिखती है व्यथा
मेरी
आत्म कथा
....................................
          किरण सिंह

Saturday, 23 August 2014

हॄदय में पीर

हृदय मे पीर,
  नयन सजल,
ऑखो मे था अंधियारा !
      सपने चकनाचूर हुए थे ,
मन अपना था हारा !
   बुझे दीप थे ,
अंतरतम के !
  चिंगारी बना सहारा,
और हमने दीप जलाया !...........किरण सिंह

Friday, 22 August 2014

कभी कभी

कभी कभी

चली जाती हूं
अतीत के
मधुर स्मॄतियों में
जब कभी उदास होता है मन
और
मैं अतीत के
पन्नों को खोल
देखती हूं
पुरानी तस्वीरों को
फिर
तुलना करती हूं
अतीत और वर्तमान के बीच
सोंचती हूं
क्यों
इतने बदल गए हैं
हम....................किरण सिंह

Sunday, 17 August 2014

आस लगाए हम बैठे हैं

हे श्याम सलोने आओ जी
अब तो तुम दरस दिखाओ जी

आओ मधु वन में मुरलीधर
प्रीत की बंशी बजाओ जी

चीख रही है द्रौपदी फिर से
अस्मत चीर बचाओ जी

अज्ञानी हम सब मूरख हैं
गीता का पाठ पढ़ाओ जी

राग द्वेष से मुक्त करो हमें
अपना रूप दिखाओ जी

लो जन्म कि कहे यशोदा
सखियाँ सोहर गाओ जी

©किरण सिंह

Friday, 15 August 2014

सांसों में निज प्राण भर लें

सांसों निजमें प्राण भर लें

संकल्प सूत्र में पुष्प पिरोकर
देश रत्न को .माल्यार्पण कर
चन्दन मिट्टी से तिलक कर
कोटि कोटि ...प्रणाम कर लें
सांसों में निज ..प्राण भर लें

सबसे ऊँचा ध्वज फहराकर
मातृभूमि पर शीश झुकाकर
रक्षण का ...मन में प्रण कर
जीवन को ..साकार कर लें
सांसों में निज ..प्राण भर लें

देशभक्ति हॄदय..... में भरकर
भावना उठे जो .......सस्वर
विजय गीत गाएं हम मिलकर
स्वतंत्रता का शंखनाद कर लें
सांसों में निज ....प्राण भर लें

जय हिंद 
जय भारत
वन्दे मातरम्........... किरण सिंह

Wednesday, 13 August 2014

महा दान

!!!!!!!!!! महा दान !!!!!!!
******************
विचार बदल रहा है
समाज का
माना
शुरू हो गई है
लड़के और लड़कियों में
फर्क न करने की
कवायद
माना
दिया जा रहा है दोनो को
अधिकार  बराबर
माना
हर क्षेत्र में अव्वल हो रही हैं
लड़कियाँ
यह भी माना
माता पिता की देख भाल भी
बेटों से बेहतर करतीं हैं
बेटियाँ
फिर भी परम्पराओं के बंधन में
बांधकर
रीतियों के जंजीरों में
जकड़कर
अपने ही घर के सभी
अधिकारों से
बेदखल कर
आज भी कर दी जाती है
बेटियों का
किसी वस्तु की भांति
महादान
कन्यादान
***********************
© Copyright Kiran singh

स्वतंत्रता क्या मिली

जय विज्ञान

स्वतंत्रता मिली है
अभिव्यक्ति की
फिर कोई क्यों न निकाले
बाल की खाल
किसी व्यक्ति की

महा ज्ञानी हैं सभी
फिर क्यों किसी की सुने कभी 
आसां है इल्जाम मढ़ना
क्यों फिक्र अंजाम का
करना
समझकर भी
नासमझ बन बैठे हैं सब
षडयंत्र को

दोषारोपण ही एक तरीका है
कि सिस्टम
बहुत खराब है
चिन्ता तो बस यही है कि
कौन लायेगा
दुरूस्त करने के लिए
किसी
यन्त्र को

क्या भ्रष्टाचार स्वयं
चली आई  ?
या हमने  आमन्त्रण
भिजवाई  ?
सोचना होगा सीखना होगा
इसे
खत्म करने वाले
मूल
मन्त्र को

जय जय जय हो
विज्ञान
निकल पड़े हैं वैज्ञानिक
करने कुछ नया
अनुसंधान
रोबोट ही दुरुस्त करेगा
शायद
प्रशासन
तंत्र को
.................................
©copyright Kiran singh

रिमझिम फुहारों में

रिमझिम फुहारों में
भीगती लतिकाएँ
  नाचती झूमतीं
  लिपटती लतिकाएँ
   जैसे कह रहीं हों
   तू भी आ थोड़ा
   नाच ले मेरे साथ
   ये जिन्दगी छोटी सी है
   चलो खुशियों को
    मिलकर मनाएं.............. किरण सिंह

तुम ही क्यों न विषय बन जाते

तुम ही क्यों न विषय बन जाते

तुम ही क्यों न विषय बन जाते 
सारे गीत लिखा जो मैंने
तुम सुर में सजाते .......
दूर रहो कितना भी  मुझसे  
स्मृतियों में निकट आ जाते 

तुम ही क्यों न विषय बन जाते 
नयन दर्पण में बसे तुम्ही हो 
कैसे बिसमृत कर पाते ......
पलके भी बंद हुए कभी तो ..,
मंत्रमुग्ध खड़े मुस्काते ........

तुम ही क्यों न विषय बन जाते 
पथ हो कितने अलग अलग 
लक्ष्य एक हो जाते ..........
शब्द यदि कभी झूठ कहें तो
सत्य नयन कह जाते ........

तुम ही क्यों न विषय बन जाते
लिखती हूँ जब और विषय फिर
तुम क्यों मेरे सम्मुख आते
लेखनी चल पडती और ...
मेरे भाव तेरा वर्णन कर जाते

तुम ही क्यों न विषय बन जाते..................किरण सिंह7

Wednesday, 6 August 2014

अब जरा विश्राम कर लूं

अब जरा विश्राम कर लूँ
*****************
जिन्दगी की बिथियों में
थक गए हैं पांव पथ में
मनोभावनाओं को क्यों न एक नई कविता मैं गढ़ लूँ
अब जरा विश्राम कर लूँ

दिन भी अब ढल चुके
शाम भी होने को ..है
स्याह तम को चाँदनी से मैं अभी उजियार कर लूँ
अब जरा विश्राम कर लूँ

मुरझाए कहीं नहीं जो
मन में खिले शब्द भाव
भावनाओं को शब्द में गढ़ छन्द में रस अलंकार भर लूँ
अब जरा विश्राम कर लूँ

जिन्दगी का क्या भरोस
कब वो दे देगी ...धोखा
जिन्दगी से कुछ वक्त चुराकर
साहित्य सुधा रस पान कर लूँ
अब जरा विश्राम कर लूँ

जब न हम होंगे जहां में
रह जाएंगी खुशबू हवा में
अपनी मुखरित संवेदनाओं को को पुस्तकों के नाम कर लूँ
अब जरा विश्राम कर लूँ
...............................   
©Copyright  Kiran singh

Tuesday, 5 August 2014

स्वतंत्रता क्या मिली

स्वतंत्रता क्या मिली
अभिव्यक्ति की
जिसे देखो वहीं दोष
देने लगे हैं
तंत्र को

अचम्भा तो तब होता है
जब इल्जाम
मढ़ने वाले ही
अंजाम देतें हैं
षडयंत्र को

आदत सी बन गई है
दोषारोपण की
कहते हैं सिस्टम
बहुत खराब है
फिर लाओ
दुरूस्त करने वाले
किसी
यन्त्र को

क्या भ्रष्टाचार स्वयं
चली आई  ?
या आपने आमन्त्रण
भिजवाई  ?
सोचो
और सीखो इसे
खत्म करने वाले
महा
मन्त्र को.........................किरण सिंह

इच्छओं के वश में

इच्छाओं के वश में
चल रही है आत्मा
भटक रहा है मन
भौरों सा चंचल
साधनाओं को तोड़ती
कामना
चला जा रहा जीवन
कस्ती की तरह
पार करने की
ललक
और डूब जाने का
भय
तब उसको याद कर
करते हैं नमन
और कहते हैं
पार लगाओ
हे ईश्वर...................किरण सिंह

Saturday, 2 August 2014

जिसने मुझे नेह डोर से

जिसने मुझे. नेह डोर से
बांध लिया वो तुम ही हो
प्रीत हॄदय के तार मूक में
ध्वनि छेड़ते तुम ही ..हो

हिय प्रीति जो छन्द बनी वो
विषय गीत के तुम ही हो
और जीवन के गीतों ..के
सांसों के सरगम तुम ही हो

कंगन के ...खनकारों ने
जो नाम पुकारा तुम ही हो
पायल की छनकारों ..में
राग सुनाते तुम ही ...हो

मन में मचलती लहरों का
दरिया किनारा तुम ही हो
डूब जाना ...चाहे जिसमें
वो सागर भी .तुम ही

......किरण सिंह ........