!!!कितना प्रेम था !!!
कितना प्रेम था उसे रंगों से
माथे पर रंग बिरंगी
बिंदियां
चांद सितारों से
भरा मांग
और
हथेलियों पर मेहदी रचाकर
जिसपर
छपा था पिया का नाम
खनकाती हरी
चुडियाँ
और
छमकाती पायल आती थी वो
सतरंगी चुनर
ओढे
व्रत उपवास भी रखती थी
अखंड सौभाग्य
के लिए
मंदिर मंदिर दिये भी
जलाती थी
पर
नियति का क्रूर चक्र
आह
कितनी बदल गई थी वो
तन पर श्वेत वस्त्र
शान्त निरीह
आँखों में थे उसके अनेकों
प्रश्न
जब बड़ी प्रेम से गई थी वो
हल्दी के रस्म में
और सास ने कहा
रुको
सिर्फ सुहागिनों के लिए है
यह रस्म
क्यों
क्रूर रीतियँ सिर्फ
स्त्रियों के लिए
ही हैं ......?.........................किरण सिंह