Wednesday, 13 August 2014

तुम ही क्यों न विषय बन जाते

तुम ही क्यों न विषय बन जाते

तुम ही क्यों न विषय बन जाते 
सारे गीत लिखा जो मैंने
तुम सुर में सजाते .......
दूर रहो कितना भी  मुझसे  
स्मृतियों में निकट आ जाते 

तुम ही क्यों न विषय बन जाते 
नयन दर्पण में बसे तुम्ही हो 
कैसे बिसमृत कर पाते ......
पलके भी बंद हुए कभी तो ..,
मंत्रमुग्ध खड़े मुस्काते ........

तुम ही क्यों न विषय बन जाते 
पथ हो कितने अलग अलग 
लक्ष्य एक हो जाते ..........
शब्द यदि कभी झूठ कहें तो
सत्य नयन कह जाते ........

तुम ही क्यों न विषय बन जाते
लिखती हूँ जब और विषय फिर
तुम क्यों मेरे सम्मुख आते
लेखनी चल पडती और ...
मेरे भाव तेरा वर्णन कर जाते

तुम ही क्यों न विषय बन जाते..................किरण सिंह7

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