तुम ही क्यों न विषय बन जाते
तुम ही क्यों न विषय बन जाते
सारे गीत लिखा जो मैंने
तुम सुर में सजाते .......
दूर रहो कितना भी मुझसे
स्मृतियों में निकट आ जाते
तुम ही क्यों न विषय बन जाते
नयन दर्पण में बसे तुम्ही हो
कैसे बिसमृत कर पाते ......
पलके भी बंद हुए कभी तो ..,
मंत्रमुग्ध खड़े मुस्काते ........
तुम ही क्यों न विषय बन जाते
पथ हो कितने अलग अलग
लक्ष्य एक हो जाते ..........
शब्द यदि कभी झूठ कहें तो
सत्य नयन कह जाते ........
तुम ही क्यों न विषय बन जाते
लिखती हूँ जब और विषय फिर
तुम क्यों मेरे सम्मुख आते
लेखनी चल पडती और ...
मेरे भाव तेरा वर्णन कर जाते
तुम ही क्यों न विषय बन जाते..................किरण सिंह7
No comments:
Post a Comment