अब जरा विश्राम कर लूँ
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जिन्दगी की बिथियों में
थक गए हैं पांव पथ में
मनोभावनाओं को क्यों न एक नई कविता मैं गढ़ लूँ
अब जरा विश्राम कर लूँ
दिन भी अब ढल चुके
शाम भी होने को ..है
स्याह तम को चाँदनी से मैं अभी उजियार कर लूँ
अब जरा विश्राम कर लूँ
मुरझाए कहीं नहीं जो
मन में खिले शब्द भाव
भावनाओं को शब्द में गढ़ छन्द में रस अलंकार भर लूँ
अब जरा विश्राम कर लूँ
जिन्दगी का क्या भरोस
कब वो दे देगी ...धोखा
जिन्दगी से कुछ वक्त चुराकर
साहित्य सुधा रस पान कर लूँ
अब जरा विश्राम कर लूँ
जब न हम होंगे जहां में
रह जाएंगी खुशबू हवा में
अपनी मुखरित संवेदनाओं को को पुस्तकों के नाम कर लूँ
अब जरा विश्राम कर लूँ
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©Copyright Kiran singh
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