जिसने मुझे. नेह डोर से
बांध लिया वो तुम ही हो
प्रीत हॄदय के तार मूक में
ध्वनि छेड़ते तुम ही ..हो
हिय प्रीति जो छन्द बनी वो
विषय गीत के तुम ही हो
और जीवन के गीतों ..के
सांसों के सरगम तुम ही हो
कंगन के ...खनकारों ने
जो नाम पुकारा तुम ही हो
पायल की छनकारों ..में
राग सुनाते तुम ही ...हो
मन में मचलती लहरों का
दरिया किनारा तुम ही हो
डूब जाना ...चाहे जिसमें
वो सागर भी .तुम ही
......किरण सिंह ........
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