!!!गृह लक्ष्मी हूँ !!!
गृह लक्ष्मी हूँ
गृह स्वामिनी हूँ
साम्राज्ञी हूँ और
अपने सुखी संसार में
खुश भी हूँ
फिर भी
असंतुष्ट हूँ स्वयं से
बार बार
झकझोरती अंतरात्मा
मुझसे पूछती है
क्या
घर परिवार तक ही
सीमित है तेरा जीवन ?
कहती है
तुम
ॠणी हो पॄथ्वी , प्रकृति
और समाज की
और तब
हॄदय की वेदना शब्दों में बंधकर
छलक आती है
अश्रुओं की तरह सस्वर
फिर
चल पड़ती है लेखनी
आवरण उतार
लिखती है व्यथा
मेरी
आत्म कथा
....................................
किरण सिंह
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