Thursday, 3 September 2015

देख चाँद

!!!!!" देख चाँद !!!!!
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देखो चाँद दशा मेरी
कुछ तुम भी दो दीक्षा
कितना लोगे तुम मेरे
धैर्य की परीक्षा  

मैं तो ठूंठ पेड़ हूँ  
कोई आता नहीं यहाँ
खग नीड़ ले उड़े  
जाने कहाँ कहाँ

ना कोयलिया गाती
ना पथिक ही कोई आता
अपनी ही जिंदगानी
अब और नहीं सुहाता

कभी पुरवाई की आहट
कभी किरण की चाहत
आस लगाए बैठे
कभी तो मिलेगी राहत

तुम ही रहे हो साक्षी
मैं था महत्वाकांक्षी
पथिक को देता आया छाया
अब नहीं किसी को माया

फिर मैं दूंगा अर्घ तुम्हें
बस सावन को आने दो  
छट जायेंगे दुख के बादल
मन में इक आस जगाने दो

नहीं रहता है समय एक सा
यह तो ध्रुव सत्य है
मैं बदलता हूँ तुम भी बदलो
यही समय का कथ्य है

जीवन में सत्कर्म करो
मत करो फल की इच्छा
नित्य पाठ करो गीता का
फिर करो समीक्षा
***********************
© copyright Kiran singhd

फिर आओ नन्दलाल धरा पर

फिर आओ नन्दलाल धरा पर
**********************
फिर आओ नन्दलाल धरा पर 
लेकर नव अवतार
फैल गया है इस धरती पर
फिर से अत्याचार

राह निहारे यशुमति मैया 
सूना है घर आंगन
मटकी दधि से भरी हुई है 
आओ खाने माखन

प्रतीक्षारत राधा रानी 

बैठीं पलक बिछाये 

छेड़ो मुरली तुम मधुवन में 

हम सब नाचे गायें 



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किरण सिंह

Sunday, 30 August 2015

मैं बावरी

मैं बावरी जोगन बन गई
पिया तुम्हारी प्रीत में

सुध-बुध अपना खो गई मैं
मन से तेरी हो गई मैं
हार कर भी दिल अपना मैं
खुश हूँ तेरी जीत में
मैं बावरी जोगन.................

पल भर भी तुझे भूल न पाऊँ
बोलो प्रीतम क्या मैं गाऊँ
जब भी लिखती छन्द में ढलकर
आ जाते हो गीत में
मैं बावरी जोगन...................

कहीं भी तुझ बिन जी नहीं लागे
कैसे हैं ये प्रेम के धागे
बांध लिये हमें जाने कैसे
छल गई मैं इस रीत में
मैं बावरी जोगन......................

हर तरफ़ दिखता तू ही है
कहीं ईश तू ही तो नहीं है
हर धड़कन में तू ही झंकृत
मेरे हर संगीत में
मैं वैरागन जोगन....................

©किरण सिंह

Tuesday, 25 August 2015

तुम अपना धीरज मत खोना


तुम अपना धीरज मत खोना
समस्याएँ आएँगी.. ही
लौट पुनः वो जाएँगी भी
घबरा कर जीवन पथ में तुम विचलित मत होना
तुम अपना धीरज मत खोना

कोशिश तो करते रहना है
लक्ष्य दूर भले कितना .है
प्रारंभिक असफलताओं से कभी हताश  मत होना
तुम अपना धीरज मत खोना

पथ में चलते रहो ..निरन्तर
जितना भी हो सके यत्न कर
काँटे छलनी किए पांव तो साहस खो मत रोना
तुम अपना धीरज मत खोना

समय एक सा नहीं रहता है
उसकी नियति में चलना है
लौटेगा जब काल चक्र तुम खुशियों के पुष्प पिरोना
तुम अपना धीरज मत खोना
……………………………
© किरण सिंह

Monday, 27 July 2015

अगली पीढ़ी के लिए

अगली पीढ़ी के लिए
****************

यकीं कर राहों पर
जब स्वयं
बढ़ते हैं कदम
लक्ष्य की तरफ
तब
पीछे छूट जाते हैं
अपने ही कदमों की
निशानियाँ
साथ रह जाती हैं कुछ
खट्टी-मीठी
अनुभूतियाँ
और बिछड़े हुए पथिक की
स्मृतियाँ
फिर हम बिछाना चाहते हैं
उन राहों पर
मखमल
अगली पीढ़ी के लिए
कि कहीं हमारी तरह
उनके पांव भी
न हो जाएँ
छलनी
तभी तो हम
सुनाते हैं
अपनी भूली बिसरी
कहानियां
और सौप देना चाहते हैं उन्हें
अपनी
कुछ
जिम्मेदारियां
*********************
©कॉपीराइट किरण सिंह

Thursday, 11 June 2015

फुर्सत के क्षण

!!!!!!!!!!!अतीत!!!!!!!!!!

फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

जाता है स्मॄतियों के वन
घूमता ग्रामीण उपवन
सहज ,सरल ,सुन्दर
गावों का ,  चित्रण करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

चौखंडी मिट्टी का घर
लीपता गायों का गोबर
आँगन में तुलसी का पौधा
स्मॄति में भ्रमण करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

आँखों में वो स्नेह अब कहां
अपनापन वो स्पर्श में. कहां
निश्छल  स्नेह पवन सा
आज भी मन शीतल करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

रात में परियों की कहानी
सुबह रामायण सुनाती
वो मीठे स्वर आज भी
कर्णों में गुंजन करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

गुड्डे गुड़ियों संग खेलना
दियों की तराजू में तोलना
मिट्टी के खिलौने बचपन के
आज भी मन चंचल करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है
……………………………………………
© copyright @ Kiran singh

Sunday, 7 June 2015

जाने कैसे

जाने कैसे
*******
आज के ही दिन
हल्दी के रंगों के साथ
चढ़ गई थी
बेरंग जीवन में मेरे
कई रंग
एकसाथ
जाने कैसे

जाने कैसे
मन की हथेलियों पर
कूट पीसकर
मेहंदी से
उकेर दिए गए थे
फूल पत्तियों के साथ
सिर्फ एक ही
अमिट
नाम
जाने कैसे

जाने कैसे
महसूस
होने लगी थी
पहली बार
सजी धजी सी खास
नई नवेली सी
सिंदूरी शाम
सुनहरी
जाने कैसे

जाने कैसे
वो स्याह रातें
चांदनी की चादर ओढ़कर
चुपके से कहीं से
अनेकों रंग चुरा
लाईं थीं
अपने संग
जाने कैसे
जाने कैसे
************************
©Copyright Kiran singh

Wednesday, 3 June 2015

मन मौजी कलम

मनमौजी कलम
************
जब
क्रोध से
काँप उठता है मन
तब
बढ़ जाती है अचानक
हृदय की
धड़कन
और
मस्तिष्क करने लगता है
बेतुके से प्रश्न
तब
अनायास ही
चल पड़ती है ये मेरी
मनमौजी
कलम
************************
©Copyright Kiran singh

Friday, 22 May 2015

आया सावन.......

आया सावन बहका बहका
*******************

बीत गए दिन रैन तपन .के
आया सावन बहका बहका

झेली बिरहन दिन रैन दोपहरी
अग्नि समीर का झटका
खत्म हो गई कठिन परीक्षा
भीगत तन मन महका

आया सावन.................

आसमान का हृदय पसीजा
अश्रु नयन से छलका
प्रिय के लिए सज गई प्रिया
हरी चूनरी घूंघट लटका

आया सावन...................

देख प्रणय धरती अम्बर का
बदरी का मन चहका
बीच बदरी के झांकते रवि का
मुख मंडल  भी दमका

आया सावन........................

रिमझिम बारिश की बूंदो में
भीगी लता संग लतिका
झुक कर धरणी को कर नमन
खुशी से खुशी मिले हैं मन का

आया सावन...................

चली इठलाती पवन पुरवैया
तरु नाचे कमरिया लचका
रुनक झुनुक पायलिया गाए
संग संग कंगन खनका

आया सावन.................

इन्द्रधनुष का छटा सुहाना
सतरंगी रंग ....छलका
हरियाली धरती पर बिखरी
अम्बर का फूटा मटका

आया सावन.......................
…………………………………….......
© copyright @ Kiran singh

नारी सिर्फ माधुर्य नहीं है

नारी सिर्फ माधुर्य नहीं है
नव दुर्गा अवतारिणी है
तुम यदि हो महिषासुर
वह चणडी रूप धारिणी है

शील है सौन्दर्य है 
वैदिक ऋचा है वो 
देवता वन्दन करते
स्वयं वन्दना है वो 

शक्ति है संघर्ष है 
लक्ष्मी की प्रतिमा है वो 
बुद्धि प्रबल करती
स्वयं शारदा है वो

सॄष्टि है श्रॄंगार है
धीर धरा है वो
चेतन जगत की
स्वयं चेतना है वो

तुम क्या छलोगे उसे
स्वयं छलना है वो
तुम क्या दोगे उसे
स्वयं दाता है वो

मत रोको प्रवाह को
बहने दो सरिता है वो
तारिणी जगत की
स्वयं गंगा है वो

सूर्य की किरण है
धूप की छटा है वो
चाँदनी निशा की और
शीतल हवा है वो
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©copyright @Kiran singh

Sunday, 17 May 2015

कहाँ गये वे दिवस सखी री

कहाँ गये वे दिवस सखी री , कहाँ गईं अब वे रातें।

झगड़ा – रगड़ा, हँसी ठिठोली, वह मीठी – मीठी बातें।

दादी की उस कथा – कहानी में रहते राजा – रानी ।

रातों में सुनते थे पर दिन में करते थे मनमानी।

भीग रहे थे हम मस्ती में, जब होती थी बरसातें।

कहाँ गये वे दिवस सखी री………………………

पूछा करते थे कागा से, अतिथि कौन आयेगा कह।

पवन देवता से करते थे , मिन्नत की जल्दी से बह।

रात चाँदनी बाँट रही थी, छत पर सबको सौगातें।

कहाँ गये वे दिवस सखी री………………………

रिश्तों में तब था अपनापन, सब अपने से लगते थे ।

बिना दिखावा के मिलजुलकर, हम आपस मे रहते थे।

मन था हम सबका ही निश्छल, कोमल थी हर जज्बातें।

कहाँ गये वे दिवस सखी री………………………

छत पर हम तारे गिन – गिनकर, सपनो में रंग भरते थे।

संग हमारे अपने थे तो , नहीं किसी से डरते थे।

विकट घड़ी में भी रहते थे, तब हम सब हँसते गाते।

कहाँ गये वे दिवस सखी री………………………

चौखंडी आँगन में तुलसी, लहरा कर अपना आँचल।

बुरी बला को दूर भगाकर, भर देती थी हममे बल।

शायद इसी वजह से हम तब, नहीं बेवजह घबराते।

कहाँ गये वे दिवस सखी री………………………

दिवाली के बाद दियों को, तुला बनाकर हम खेले । 

पता नहीं क्यों याद आ रहे, बचपन वाले वे मेले। 

मिट्टी के वे खेल – खिलौने तोल – मोल कर  ले आते। 

कहाँ गये वे दिवस सखी री……………………… 

आइस – बाइस कित – कित गोटी, खेल हमारे होते थे। 

बातें करते – करते छत पर, निश्चिंत हो सोते थे। 

मीठे – मीठे सपने आकर, मन हम सबका बहलाते। 

कहाँ गये वे दिवस सखी री……………

Saturday, 16 May 2015

बुजुर्ग

तेज भागती हुई जिन्दगी में समय नहीं है किसी के पास..! आज सभी भाग रहे हैं रेस के घोड़े की तरह
जिनका मकसद सिर्फ रेस जीतना है चाहे उसके लिए कितनी ही कुर्बानी देना पड़े..! पाने की धुन में क्या खोया किसी को खबर नहीं.... हो भी कैसे... कौन समझाए...! टुकड़े टुकड़ों में बिखर गया है परिवार... चलन हो गया है एकल परिवार का... उसमे भी पति पत्नी दोनों कमाऊ... कहां से समय निकाल पाएंगे वे बुजुर्गों के लिए  दुष्परिणाम भुगत रहे हैं हमारे बुजुर्ग..!चूंकि हमारे बुजुर्गों ने अपने बच्चों के खुशियों के लिए अपना सर्वस्व  ( तन , मन , और धन ) न्यौछावर कर दिया...! बच्चों की परवरिश में कभी नहीं सोचा कि कभी उन्हें अपने ही घर में अकेलेपन और उपेक्षा का सामना करना पड़ेगा...! परन्तु वे दोषी ठहरायएं भी तो किसे उन्होंने स्वयं ही तो स्वयं को लुटा दिया था..अपनो में ! अपने भाग्य को कोसते हुए काट रहे हैं वे एक एक पल..! गुजारिश करते हैं ईश्वर से कि वे ही अपने घर बुला लें पर ईश्वर भी तो मनमौजी ही है.. कहाँ सुनता है वो भी उनकी... भज रहे हैं घर के किसी कोने में राम नाम...!
सोंचती हूँ उनके अकेलेपन से कहीं बेहतर होता ओल्डएज होम.. देखकर डरती हूँ अपने भविष्य से..
सोंचती हूँ बुक करा ही लूँ ओल्डएज होम . अभी तो हाथ पैर चल रहा है..! बच्चे तो सपूत हैं पर बस जाएंगे बिदेश में या देश के किसी कोने में   फिर कहाँ फुर्सत मिलेगा..! बोया बबूल तो आम कहाँ से मिलेगा....!
या फिर सोंचती हूँ किसी बेघर को ठौर देकर रख लूँ अपने  घर में.. कम से कम सेवा तो करेंगे..! फिर डरती हूँ कि...............
अरे मैं भी कहाँ अपने भविष्य में उलझ गई..! बहुत मुश्किल भी नहीं है बुजुर्गों की समस्याओं का समाधान..हम जरा भी ध्यान रखें तो..!
घर लेते समय यह ध्यानमें जरूर रखना चाहिए कि हमारे पड़ोसी भी समान उम्र के हों ताकि हमारे बुजुर्गों को उनके माता पिता से भी मिलना जुलना होता रहे और हमारे बुजुर्ग भी आपस में मैत्रीपूर्ण संबंध रखते हुए दुख सुख का आदान प्रदान कर सके..! मंदिरों में भजन कीर्तन होता रहता है उन्हें अवश्य भेजें.. प्रार्थना और भजन कीर्तन से मन में नई उर्जा का प्रवेश होता है जिससे हमारे बुजुर्ग प्रसन्न रहेंगे..! मानते हैं कि समयाभाव है फिर भी कुछ समय चुराकर बुजुर्गों के साथ बिताएं जिससे आपको तो आत्मसंतोष मिलेगा ही.. बुजुर्गों को भी कितनी प्रसन्नता मिलेगी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है ..! समय समय पर उपहार स्वरूप उन्हें किताबें भेट करें जिसे पढ़कर उनके अन्दर सकारात्मक विचार पनपे..! यकीन मानिए बुजुर्गों की सेवा से मेवा जरूर मिलता है जरा करके तो देखिए..!
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©Copyright Kiran singh

काहे अतीत तोरी सुधि आए

काहे अतीत तोरी सुधि आए
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स्मृति वन में मन हिरण
करत रहत विचरण
सब जन बीच रहूँ हम तबहूँ
एकल मन होई जाए

काहे अतीत तोरी सुधि आए

राग गीत संगीत बजत हैं
किछु नाहीं मन भाए
सब जन झूम झूम नाचत हैं
म्हारो मन काहे कुम्हिलाए

काहे अतीत तोरी सुधि आए

करत रहत सब हंसी ठिठोली
म्हारो मन नैहर जाए
माटी चूल्ह माटी को बासन
खेलत ब्यजन पकाए

काहे अतीत तोरी सुधि आए

छाती पीर पाती में  लिखूं तब
नयन नीर झरि जाए
काहे न ईश कृपा करि हम पर
सखि तोसे देत मिलाए

काहे अतीत तोरी सुधि आए

सरल सभी जन मन निर्मल
नयन मा नेह भरि आए
छल प्रपंच से दूर बालपन
काहे न देत पुनि लौटाय

काहे अतीत तोरी सुधि आए
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©Copyright Kiran singh

Tuesday, 5 May 2015

चिट्ठी

चिट्ठी
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तू कवि है कविता मैं तेरी
लिखो मुझे पर चोरी - चोरी 
चमक चमक कर कहे बिंदिया 
तू है मेरा मैं हूँ तेरी

छनके पायल खनके चूड़ी
कहे जिया की.बात अधूरी
पलक बिछाए करे प्रतीक्षा
कजरारे से नयना मोरी

मैं ही लिखती हूँ करजोरी
समझो प्रिय मेरी मजबूरी
चिट्ठी पढ़ते ही आना तुम
वर्ना करूंगी मैं बलजोरी

नहीं चलेगा नया बहाना
मत कहना अब है मजबूरी
छोड़ो भी अब बात बनाना 
अब मिलना है बहुत जरूरी
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©किरण सिंह

Sunday, 3 May 2015

चाहा था मैंने पलकों में

चाहा था मैंने पलकों में
°°°°°°°°°°°°°°°°°°
चाहा था मैने पलकों में
सपनों का महल बनाना
तुम जो ठहरे छलिया ,
छल कर किया नया बहाना 

पहना कर पायल की बेड़ी
कंगन की हथकड़ियाँ
सिंदूरी सस्कृति से लिखकर
मुझे उम्र कैद कर लिया

मैं भी मूर्खा जो ठहरी
स्वीकृति कर नीयति को
मुस्कुरा कर चल पड़ी और
बदल दिया निज लक्ष्य को

नाक नथनी जंजीर रीति का
चूनर ओढ़ ली संस्कृति का
पारंपरिक करधनी पहन मैं
सम्हाला घर अपने पी का

अब तो न्याय करो न्यायधीश
मैने निभाया सातों वचन
गढ़ दिया काव्य नवल
अब तुम करो आत्ममंथन
*************************
© किरण सिंह

Monday, 27 April 2015

मुक्तक

बिन आहट के चूड़ी , खनकती नहीं
जब देखूं तो पलकें ,  झपकती नहीं
भाव आतुर हुए. , गीतों में सज गए
मेरी बहकी कलम अब ठहरती नहीं
*************************
©Copyright Kiran singh

मुक्तक


फूल भावों के जब भी महक जाते हैं
वर्ण शब्दों में, ढलकर बहक जाते हैं
दिल धड़कते उन्ही से मचलते कभी
गीत घूंघरू में बंधकर छनक जाते हैं
*************************
©Copyright Kiran singh

जीवन पथ


जीवन पथ एक अनुभव है
हर पड़ाव परिवर्तन है
लगातार चलते जाना
यही तो कहता जीवन है

लेखक तो लिख देता है
कहां कोई  पढ़ लेता है
कब कहानी पूरी होगी
कौतूहल विजेता है

जीवन एक नदी सी है
चलती सांसे कस्तीसी है
कोई डुबा कोई पार किया
कोई तैराकी गुरु ज्ञान दिया

मन मतवाला मचला ना कर
कठपुतली तू नर्तन आ कर
खींचेगा वो डोर तुम्हारा
करो भरोसा खुद खुदा पर
…………………………………………..
© copyright @ Kiran singh

Wednesday, 22 April 2015

काश

काश
*****
चलती थी पहले भी
मेरी कलम
कर रही हूं
स्मरण
जिन्हें मैंने
डायरी के पन्नों पर
लिखे थे
कुछ स्मृतियाँ
घुटन महसूस कर रही हैं
आज भी
बंद आलमारी में
कुछ को
बेच दिए गए
कचरे के साथ
जिनमें अंकित थे
मेरे अनेकों
भाव
कुछ कस्ती बनकर
बह गए
सपनों के संग
और कुछ फाड़कर
उड़ा दिए गए
खिल्ली
भावनाओं की
बिवस
हम चुप सह जाते
काश
फेसबुक
तुम पहले आते
………………………………….....
©copyright Kiran singh

Saturday, 18 April 2015

आओ हम सब मिलकर

आओ हम सब
***********
आओ हम सब मिलजुल कर 
ऐसे घर का निर्माण करें 
माँ भारती विराजे ऊपर
झुक दुनिया प्रणाम करे

विश्वास से नीव भरें हम
लौह प्रीति की ईंट बने हम
ज्ञान विज्ञान का दीप जलाएँ
त्याग समर्पण भीत बने हम

पूरब उत्तर के कोने पर
कर कृतिका मिट्टी सोने पर
कर स्थापित पूज्य भारती  
करें आरती सांझ होनेपर

मन्दिर मस्जिद चर्च रहे और 
सिक्खो का गुरुद्वारा हो  
लहराता रहता छतपर
अपना तिरंगा प्यारा हो

हर दिल मे जलता रहता 
राष्ट्र प्रेम का ज्वाला  हो 
एक जाति और एक धर्म का
राष्ट्र प्रेम रस प्याला हो

आओ हमसब मिलजुलकर
तूलिका पदचिन्ह बनाएँ
माँ का पाँव पड़े पहले
हम तिरंगा लिए लहराएँ
********************
©Copyright Kiran singh

भोर लालिमा लिए किरण

भोर लालिमा लिए किरण
मन में आस जगावत
निशा विदा होकर गई
दिवस अति मन भावत
चूचू कर चिड़िया आंगन में
मधुरम् मंगल गावत
उठो उठो अब भोर भयो कह
कर्म को पाठ पढ़ावत
हुआ स्फुर्त तभी तन मेरा
मन चंचल हो आवत
कर अग्रे वसते लक्ष्मी
मन आत्मसात करवावत
करमूले गोविंद देख कर
झुकी झुकी शीश नवावत
************************
©किरण सिंह

Friday, 13 March 2015

छल कपट भरे

छल कपट भरे
**********
छल कपट भरे इस जगत में
तुम भी तो प्रिय छली हो गए

सात समंदर पार क्या गए
भूल गए हिन्द और हिन्दी
मैं बावरी बैरागन बन गई
फीकी पड़ी माथे की बिन्दी
सात फेरे संग वचन लिए
उन्हें भूल तुम कहाँ खो गए
छल कपट भरे ............

नहीं गाते अब भोर भैरवी
कैसे करूँ मैं ,  तेरी पैरवी
नहीं गाते अब सांझ आरती
संस्कृति छोड़ दिए भारती
चकाचौंध में फंस गए तुम भी
संस्कार तुम कहां छोड़ गए
छल कपट भरे ...

नहीं सुहाता है अब कत्थक
जाते हो तुम डिस्को
डियर डार्लिंग पसंद आ गई
प्रिया प्रिय भाता है किसको
सरसो साग मक्के की रोटी का
स्वाद पिज्जा बर्गर में खो गए
छल कपट भरे ...

जाना था परदेश पिया तो
मुझे भी संग लिए क्यों नहीं
लौट नहीं जब आना था तो
मुझसे कह तुम दिए क्यों नहीं
प्रतीक्षा में पलक बिछाए
स्वप्न देखकर नयन सो गए
छल कपट भरे .............
***********************
©Copyright Kiran singh

Wednesday, 11 March 2015

मेरा मन

शायद
******
क्यों बेचैन मन
क्या चाहिए उसे
शायद शिकायत है
उसे
स्वयं से ही
इसी लिए असंतुष्ट
भटक रहा है
भौरों की तरह
मन
शायद

मन
देखता है
स्वर्ण पिंजर में
कैद पक्षियों को
और तुलना करता है
वेफिक्र उड़ते हुए
नील गगन में पक्षियों से
तभी एक आह
निकलती है
और तड़प उठता है
मन
शायद

शायद
मन
चाहता है पतंग उड़ाना
इसीलिए
सुलझाने लगा है
उलझे हुए पतंग की डोर को
और सुलझाने में  भूल गया
स्वयं ही स्वयं को
खुद ही उलझ गया
खुद को सुलझाने में
मन
शायद

शायद
मन की
भूली बिसरी स्मृतियां 
मेरे स्मृति पटल पर
ब्याघात कर रहीं हैं
कुंडली मारे
सर्प की तरह
और तोड़ कर बिस्मृत
चिर निद्रा
करने लगीं हैं
रात्रि जागरण
शायद
********************
©कॉपीराइट किरण सिंह

शायद नहीं देखा सकता है वे
प्रतिभाओं को
यूँ ही
कुण्ठित होते हुए
और चाहता है उनका
समुचित मूल्यांकन
मेरा मन

शायद वे जब देखता है
सत्य को न्यायालयों के चौकठ पर
सर झुकाकर न्याय की
गुहार लगाते हुए
और फिर
उसे झूठ से हारते हुए
तब सत्य का गवाह
बनना चाहता है
मेरा मन

शायद नहीं सहन होता है उसे
उन अजन्मी कन्याओं का
करुण क्रन्दन
चाहता है उन्हें माँ के
आँचल की छांव देना
और अपनी
विवशता पर अकेले
छटपटाता है
मेरा मन

शायद नहीं देख सकता
औरों के लिए महल बनाने वाले
मजदूरों को
जो स्वयं सड़कों पर
बेफिक्र सो रहे हैं
अपने पलकों में
अनगिनत स्वप्न बंद किए
तब न जाने क्यों
उनके सपनों को
साकार करना
चाहता है
मेरा मन

शायद नहीं देख सकता है वह
बालश्रमिकों को
सिर्फ
रोटी के लिए
घरों में, होटलों में
जूठन साफ करते हुए
और फिर
थके हुए हथेलियों से छूटकर
प्लेटों के टूट जाने पर
बेरहमी से पिटते हुए
मेरा मन

शायद नहीं देख  सकता
भोले भाले लोगों को
ढोंगी बाबाओं के जाल में फंसकर
छटपटाते हुए
और चाहता है उन्हें
अंधविश्वास के
मकड़जाल से निकालना
मेरा मन
********************
©Copyright Kiran singh

Saturday, 28 February 2015

मुक्तक


सुप्त चेतना जागरण के लिए कलम चलती रहेगी
लक्ष्य की तरफ वो अपने , निरन्तर बढ़ती रहेगी
अवरोधक बिछे ज्यों कंटक. पांव चूमते अगर हैं
रक्त में ही डूबकर नए छन्द , कलम गढ़ती रहेगी
***********************
©Copyright Kiran singh

रिश्तों में

रिश्तों में कुछ मधु घोलकर , प्रेम प्याला में पिला दिया
चाहे जिसने याद रखा हो , या फिर मुझको भुला दिया
स्मृतियों में अंकित है मेरे ,  आप सभी का अपनापन
लो आ गई मैं लौटकर ,   लेकर अपनी अभिव्यक्तियां
***********************
©Copyright Kiran singh


रंगों की सौगात लेकर

रंगों की सौगात लेकर
आई होली आई

शीत बिटिया दूल्हन सकुचाई
रंगों में रंग सब सखि नहलाई
पिया मिलन को कर तैयारी
सज धज कर गोरी आई
रंगों की सौगात ..........

रंग रंगे बाराती संग
मस्त हुए वे पीकर भंग
ढोल मजीरा बाजन लागे
सखि सब भी मंगल गाई
रंगों की सौगात...............

आँखों में भर कारे काजर
पांवो में भर लाल महावर
गाल गुलाबी हुए शरम से
लाल अधर मुस्काई
रंगों की सौगात.........

धरा सजी रंगीन सेज सी
प्रकृति सुन्दरी लगती प्रेयसी
इठलाती बलखाती गोरी सी
फागुन लेती अंगड़ाई
रंगों की सौगात..............
***********************
©Copyright Kiran singh

होरी गाएं

क्यों न रंगाएं
*********

मधुरिम मधुकर मधुबन गुंजन
हर्षित हो मन करता नर्तन
देखत स्वप्न नयन अति सुन्दर
ऋतु फागुन  रंग लागे बरसन

होरी खेलत हैं ब्रज बाला
कृष्णा रंग में भीग गयीं हैं
कोरा मन रंगन अकुलाई
देख श्याम को रीझ गयीं है

प्रीत रंग बरसन लागे
भीगन को मन भया विवश
गारी गा कुण्ठा झुलसे
मिटती कटुता हरसे अंतस

जुगलबंदी पी संग मन भाए
चलो सखी हम होरी गाएं
तन मन कोरा रह नहीं जाये
सभी रंगों में चलो रंगाएं

©किरण सिंह

Friday, 13 February 2015

जीवन के गीतों में

जीवन के गीतों के

जीवन के गीतो के
आरोह और अवरोहों में
मेरा समर्पण
पकड़
चल रही सांसों की
सरगम निरन्तर
सुन्दर

तुम्हारे मन्द्र सप्तक के
स्वर
मेरे तार सप्तक के स्वरों से
मिलकर
मध्य सप्तक को पकड़
गढ़ जाते हैं राग एक
सुन्दर

खनक कंगन
छनक पायल
तोड़ तुम्हारे नींद निशा में
भर श्रॄंगार रस
लिखा काव्य
मन से गढ़
सुन्दर

कुछ तुम कहकर
कुछ हम सहकार
प्रेम का समन्वय यह
जीवन
चल रहा है
बहती सरिता सी
छल छल
निर्मल
सुन्दर
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© copyright @ Kiran singh

Wednesday, 11 February 2015

उलझन

!!!!!!!!!!!!!!! उलझन !!!!!!!!!!!!!!!!!
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एक शहर में सावन बरसे दूसरे में है तपन
किस शहर में मैं रहूँ उलझन में है मन

एक शहर में कामना तो दूसरे में है समर्पण
एक शहर में ज्योति है तो दूसरे में जीवन

विवश हो बढ़ चले कदम एक शहर की ओर
दूसरा शहर है खींचे मेरे मन की डोर

एक शहर में है मुझे ज्योति अभी जलाना
दूसरे शहर में है जिंदगी सजाना

प्रश्न कर रहा मेरा मन , मैं बढू किस ओर
कैसे दे उत्तर हृदय किस पथ को दे छोड़
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   © copyright  @ Kiran singh

Sunday, 8 February 2015

सर्जरी से पहले

वेदना पिघल कर आँखों से छलकने को आतुर थीं.. पलकें अश्रुओं को सम्हालने में खुद को असहाय महसूस कर रही थीं...जी चाहता था कि कोई अकेला कुछ देर के लिए छोड़ देता कि जी भर के रो लेती..........फिर भी अभिनय कला में निपुण अधर मुस्कुराने में सफल हो रहीं थीं ..बहादुरी का खिताब जो मिला था उन्हें....! कैसे कोई समझ सकता था कि होठों को मुस्कुराने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ रहा था...! किसी को क्या पता था कि सर्जरी से पहले सबसे हँस हँस कर मिलना और बच्चों के साथ घूमने निकलना , रेस्तरां में मनपसंद खाना खाते समय मेरे हृदय के पन्नों पर मस्तिष्क लेखनी बार बार एक पत्र लिख लिख कर फाड़ रही थी... कि मेरे जाने के बाद.................!
ग्यारह फरवरी २००६ रात करीब आठ बजे बहन का फोन आया... पति ने बात करने के लिए कहा तब आखिरकार छलक ही पड़े थे नयनों से नीर.... और रूला ही दिए थे मेरे पूरे परिवार को... नहीं सो पाई थी  उस रात को मैं .. कि सुबह ओपेन हार्ट सर्जरी होना था.... सुबह स्ट्रेचर आता है... उसपर मुझे लेटा दिया जाता है.... कुछ दूर चलकर स्ट्रेचर वापस आता है कि सर्जरी आज नहीं होगा......! कुछ लोगों ने तो अफवाह फैला दिया था कि डॉक्टर नरेश त्रेहान इंडिया पाकिस्तान का क्रिकेट मैच देखने पाकिस्तान जा रहे हैं..!
तब तो मुझे एक बहाना मिल गया था हॉस्पिटल से भागने का........ गुस्से से चिल्ला पड़ी थी मैं .. डॉक्टरों की टीम आ पहुंची थी मुझे समझाने के लिए....... तभी डॉक्टर नरेश त्रेहान भी आ पहुंचे थे......और समझाने लगे थे कि मुझे इमर्जेंसी में बाहर जाना पड़ रहा है... मैं चाहता हूँ कि मेरे प्रेजेन्स में ही आपकी सर्जरी हो............... .....!

Monday, 2 February 2015

हीरा

हीरा
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खादानों में
कोयले के साथ दबे
हीरे को कहाँ पता था
कि कभी कोई
जौहरी
उसे तराश कर
इतना चमका देगा
कि
वह सुशोभित होगा
राजमुकुटों में
जड़ा जाएगा
गहनों में
वह भी तो भयभीत था कि
कि मैं भी
किसी दिन
झोंक दिया जाऊंगा
दहकती भट्ठी में
चमककर
राख हो जाएगा
मेरा भी
अस्तित्व
पर
खुदा के दरबार में देर भले ही है
अंधेर कहां
भेज ही देता है वो
अपने बंदे को
जो तराश कर
चमका ही देता है
कभी न कभी
धैर्य रख
हीरे की तरह
यकीं कर
खुद और
खुदा पर
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© copyright Kiran singh

Monday, 26 January 2015

संस्मरण सर्जरी का

आज १३ फरवरी.. नहीं भूलता यह दिन शायद यह दिन मेरे लिए पुनर्जन्म का दिन ही है...! वह सुबह करीब ९ बजे स्कार्ट हार्ट हॉस्पिटल की नर्स ने जब स्ट्रेचर पर लिटाया और ऑपरेशन थियेटर की तरफ ले जाने लगी थी तो मुझे लग रहा था कि जल्लाद रुपी परिचारिकाएं मुझे फांसी के तख्ते तक ले जा रही हैं......... हृदय की धड़कने और भी तेजी से धड़क रही थी.... मन ही मन मैं सोंच रही थी शायद यह मेरे जीवन का अन्तिम दिन है..फिर भी परिजन परेशान न हो जाएं इसलिए अपने को बिलकुल निर्भीक दिखाने का लगातार प्रयत्न करती रही थी.. ! आँखों से आँसू कहीं छलक न जाए इसलिए मैं अपने परिजनों की तरफ़ देख भी नहीं रही थी..!
परिचारिकाएं ऑपरेशन थियेटर के दरवाजे के सामने स्ट्रेचर रोक देती हैं.. और तभी किसी यमदूत की तरह डाक्टर आते हैं..  स्ट्रेचर के साथ साथ डॉक्टर भी ऑपरेशन थियेटर में मेरे साथ चल रहे थे.... चलते चलते वे अपनी बातों में उलझाने लगे थे ..जैसे किसी चंचल बच्चे को रोचक कहानी सुनाकर बातों बातों में उलझा लिया जाता है.. !
डाक्टर  ने कहा किरण जी लगता है आप बहुत नाराज हैं..! मैने कहा हाँ.. क्यों न होऊं...? और मैं हॉस्पिटल की व्यवस्था को लेकर कुछ कुछ उलाहने.देने लगी थी . तथा इसी प्रकार की कुछ कुछ बातें किये जा रही थी..!
मैने डाक्टर से पूछा बेहोश करके ही ऑपरेशन होगा न..? डाक्टर ने मजाकिया अंदाज में कहा अब मैं आपका होश में ही ऑपरेशन करके आपपर एक नया एक्सपेरिमेंट करता हूँ..! बातों ही बातों में डॉक्टर ने मुझे बेहोशी का इंजेक्शन दे दिया उसके बाद मुझे क्या हुआ कुछ पता नहीं..!

करीब ३६ घंटे बाद मेरी आँखें रुक रुक कर खुल रही थी ..! आँखें खुलते ही सामने पतिदेव को खड़े देखा तब .मुझे विश्वास नहीं हो पा रहा था कि मैं सचमुच जीवित हूँ...!कहीं यह स्वप्न तो नहीं है यह सोचकर मैने  अपने पति के तरफ अपना हाँथ बढ़ाया..जब पति ने हांथ पकड़ा तब विश्वास हुआ कि मैं सचमुच जीवित हूँ..! तब मैं भूल गई थी उन सभी शारीरिक और मानसिक तकलीफों को जिन्हे मैंने सर्जरी के पूर्व झेला था ..तब जिन्दगी और भी खूबसूरत लगने लगी थी ..!  अपने भाई , बहनों , सहेलियों तथा सभी परिजनों का स्नेह.., माँ का अखंड दीप जलाना......, ससुराल में शिवमंदिर पर करीब ११ पंडितों द्वारा महामृत्युंजय का जाप कराना..,...... पिता , पति , और पुत्रों के द्वारा किया गया प्रयास... कैसे मुझे जाने देते इस सुन्दर संसार से..! वो सभी स्नेहिल अनुभूतियाँ मेरे नेत्रों को आज भी सजल कर रहे हैं .... मैं उसे शब्दों में अभिव्यक्त नहीं कर पा रही...हूँ !
आज मुझे डॉक्टर भगवान , नर्स देवी , और स्कार्ट हार्ट हास्पिटल मंदिर लगता है..!