Friday, 26 September 2014

कन्या

!!!! कन्या !!!!

कन्या कोई वस्तु नहीं  जो 
दान मे दी जाए 
घर घर का मान है 
अपमान न की जाए 

शील है सौन्दर्य है 
वैदिक ऋचा है वह
देवता वन्दन करते
स्वयं वन्दना है वह 

सॄष्टि है श्रॄंगार है
धीर धरा समान है
चेतना जगती की
जग तीर की कमान है

शक्ति है संघर्ष है 
लक्ष्मी की प्रतिमा है वह 
ज्ञान बुद्धि दात्री
शारदा महिमा है वह

तुम क्या छलोगे उसे
व्यर्थ प्रवंचना है
तुम क्या दोगे उसे
वह दात्रि कंचना है

सूर्य की किरण है
धूप की छटा है वह
चाँदनी निशा की और
शीतल हवा है वह

मत रोको प्रवाह को
बहने दो नदी की धार है
तारिणी गंगा सी
जगत की पालनहार है

©copyright @Kiran singh

Thursday, 25 September 2014

प्रार्थना

प्रार्थना !!

हे रणचण्डी
शक्ति वर्धिनी
दुख निवारिणी
सुख प्रदायिनी
खुश होकर अब वर दो
खुशियों से आँचल भर दो

चंचल चित और
मन लोभी है
साधना नहीं होती है
मेरे मन की डोर खींच
पथ प्रदर्शित कर दो
खुशियों से आँचल भर दो

भिक्षुणी मैं तेरे
दर आई हूँ
मन में कुछ कर
प्रण आई हूँ
पावन कर कलुषित मन को
दिव्य प्रकाशमय कर दो
खुशियों से आँचल भर दो

तुम तो जननी
की जननी हो
मनोकामना
पूर्ण करती हो
सकल क्लेश को हरकर
जग में शान्ति स्थापना कर दो
खुशियों से आँचल भर दो
…………………………………………
© copyright Kiran singh

Wednesday, 24 September 2014

सिंदूर

!!!! सिंदूर !!!!!!

सच
तुम्हारे
एक चुटकी
सिंदूर ने
कैद कर लिया मुझे
हॄदय में
नथ दिया
नथनियों में
पहना कर चुडियों की
हथकड़ियां
और
पैरों में पायल की
बेडियां
अपने नाम के जंजीर
मंगलसूत्र में
बांध लिया है
तुमने
जीवन भर के
लिए

प्रेम की चुनरी
ओढाकर
माथे पर चाँद सितारों की
बिंदिया सजाकर
मेरे मन की
हथेलियों पर
मेहदी से
तुम
अपना नाम छपवा कर
कर लिया मेरी
जिन्दगी को
अपने नाम
जीवन भर के
लिए
© copyright @ Kiran singh

जिन्दगी

!!! जिन्दगी !!!!

प्रवाह में बहती
रुकतीं , ठिठकती
ठहरती
और फिर
बहती
जिन्दगी
तू
नीर है

अनेकों बार
हारकर
और फिर
हारी हुए
बाजी को
जीतती
जिन्दगी
तू
वीर है

कितनी बार
देती है खुशी
और खभी
खुशी देते देते
दे जाती है
दर्द भी
साथ
जिन्दगी
तू
पीर है

पोषण है तू
जीव जगत का
कर्म करो
वर्ना
फटी दूध सी
फेकी जाओगी
जिन्दगी
तू
क्षीर है

अपनी मर्जी से
बिना बताए
निकल जाती है
तरकश से
फिर कभी
वापस
नहीं
आने के लिए
जिन्दगी
तू
तीर है
…………………………………… …
© copyright Kiran singh

Tuesday, 23 September 2014

हार भी मान लूँ मैं कैसे

कितना भी करे कोई छल

कितना भी करे कोई छल 
तय करती चली मै सफ़र

बढी खुशियों की सौगात देकर
खुद रखा मैंने गम कुछ बचाकर

क्यूँ गिला भी हो मुझको किसी से 
खुश हूँ आदत से मजबूर होकर 

जिन्दगी को मैं रौशन  करूँगी 
चाहे बह जाए मोम पिघलकर 

गूथ दूंगी मैं पुष्पो की माला 
मुरझाने न पाएं वो खिलकर 

हार भी मान लूँ मैं कैसे 
जीतने की जो आदत है अबतक 

मुझे आता है आँसू को पीना
इस लिए चल पड़ी मुस्कुराकर

© copyright Kiran singh

कहानियाँ

कहानियाँ !!!!

कहानियाँ बहुत हैं
मेरी जिन्दगी के
कर रही हूं
स्मरण
जिन्हें मैंने
डायरी के पन्नों पर
लिखे थे
बेच दिए गए
जिन्हें
कचरे के साथ
जिनमें अंकित थे
मेरे अनेकों
भाव
कभी कस्ती बनाकर
बहा दी जाती
सपनों को
और कभी फाड़कर
उड़ा दी जाती
मेरे भावनाओं की
खिल्ली
तब तुम
कहां थे
………………………………….....
©copyright Kiran singh

Monday, 22 September 2014

धीरज मत खोना

तुम अपना धीरज मत खोना 

समस्याएँ आएँगी.. ही
लौट पुनः वो जाएँगी भी
घबरा कर जीवन पथ में तुम विचलित मत होना
तुम अपना धीरज मत खोना

कोशिश तो करते रहना है
लक्ष्य दूर भले कितना .है
प्रारंभिक असफलताओं से कभी हताश  मत होना
तुम अपना धीरज मत खोना

पथ में चलते रहो ..निरन्तर
जितना भी हो सके यत्न कर
काँटे छलनी किए पांव तो साहस रख सह लेना
तुम अपना धीरज मत खोना

समय एक सा नहीं रहता है
उसकी नियति में चलना है
काल चक्र को लौट पुनः वापस है आना
तुम अपना धीरज मत खोना
…………………………………………..
© copyright @Kiran singh

अतीत

!!!!!!!!!!!अतीत!!!!!!!!!!

फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

जाता है स्मॄतियों के वन
घूमता ग्रामीण उपवन
सहज ,सरल ,सुन्दर
गावों का ,  चित्रण करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

चौखंडी मिट्टी का घर
लीपता गायों का गोबर
आँगन में तुलसी की पौधा
स्मॄति में भ्रमण करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

आँखों में वो स्नेह अब कहां
अपनापन वो स्पर्श में. कहां
निश्छल  स्नेह पवन सा
आज भी मन शीतल करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

रात में परियों की कहानी
सुबह रामायण सुनाती
वो मीठे स्वर आज भी
कर्णों में गुंजन करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

गुड्डे गुड़ियों संग खेलना
दियों की तराजू में तोलना
मिट्टी के खिलौने बचपन के
आज भी मन चंचल करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है
……………………………………………
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Thursday, 18 September 2014

माना मैने

!!!!! माना मैंने !!!!!!

माना मैंने छलावा था वो 
मूक मेरा रह जाना 
अन्तर्मुखी प्रकृति जो थी  
मुश्किल था कह पाना 

नयन सत्य कह दे न कहीं
पलकों में अश्रु सम्हाला
होठों पर मुस्कान लिए मैं 
निज नीयति को स्वीकारा

उस पार नदी के तुम चले 
इस पार नदी के मै बैठी 
लहरों से हाल तुम्हारा 
हरदम ही पूछा करतीं 

फिर तेरी स्मृतियों को मैंने
पलकों मे बंद कर डाला 
मन के भावों को पन्नों पर 
शब्दों मे लिख डाला 
……………………………………………
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Wednesday, 17 September 2014

दीप जलाया


!! दीप जलाया !!

हृदय मे पीर,
  नयन सजल,
ऑखो मे था
अंधियारा
सपने चकनाचूर हुए थे
मन अपना था हारा
   बुझे दीप थे
अंतरतम के
  चिंगारी बना सहारा,
और हमने दीप
    जलाया
………………………………………......
© copyright @ Kiran singh

निन्दक तेरा स्वागत है

निन्दक तेरा स्वागत है 

त्रुटि कहाँ था कहाँ  पता था 
स्वयं ही स्वयं छला था 
आत्म को अन्तरात्मा से करवाता मिलन है 
निन्दक तेरा स्वागत है 

प्रशंसा में क्या रखा है
बस जरा उत्साह बढ़ा है
बचा खुचा अभिमान तोड़ तू दिखलाता दर्पण है 
निन्दक तेरा स्वागत है 

मुझको ही मुझसे मिलवाता 
स्वयं गिरकर है मुझे उठाता 
स्वयं ईर्ष्या अग्नि में जलकर तू दमकाता मेरा मन है 
निन्दक तेरा स्वागत है

झूठ कहे वो निन्दक है
सत्य कहे वो शुभचिंतक है
कलुषित अपना मन कर खुद ही
करता खुद से ही खुद छल है

निन्दक तेरा स्वागत है 
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Tuesday, 16 September 2014

सब माधुर्य तुम्हारे हैं


सब माधुर्य  तुम्हारे हैं


मैं मैं नहीं तुम, तुम नहीं

अगर एक बन जाते हैं

पलक मूंद आँखों अपने 

सपने नवल सजाते हैं 


भले रहे उसपार तुम मगर 

लहरे आती - जाती है

छू - छू कर मुझको मुझसे 

कुछ - कुछ बातें बतलाती हैं 


फिर हम तट पर बैठ रेत का 

सुन्दर महल बनाते हैं

स्मृतियों की कल्पित कलियाँ 

चुनकर स्वयं सजाते हैं 


स्वप्न लोक में ही हम दोनों 

मिलकर सेज सजाते हैं 

एक दूजे में सिमट स्नेह से 

सच्ची बात बताते हैं 


अनायास स्वयं स्वर मुखरित 

कहते भाव हमारे हैं

कविताकार हूं. मैं कविता के

सब माधुर्य  तुम्हारे हैं

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धूमिल हैं पर मिटे नहीं

धूमिल है पर मिटे नहीं

स्मृतियों में चित्र चिन्हित 
धूमिल हैं पर  मिटे नहीं 
उलझ गए पतंग के धागे 
डोर अब तक कटे नहीं 

अरसे बाद खुले हृदय के 
पट अभी बंद हुए नहीं 
राह देख थक नयन सो गए 
सपने अब तक टूटे नहीं

कागज की कस्ती भी अब तक 
तैर रहे पर  डूबे नहीं 
चाहे पथ में हो अंधेरा
दिये मन के बुझे नहीं
…………………………………….......
© copyright @ Kiran singh

खुशी

खुशी से खुशी को खुशी मिलती हो जब
दुखों से दुखी हो.... दुखी क्यों करें हम
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© copyright @Kiran singh




लक्ष्य की ओर

बढ़ चलो  तुम पथिक लक्ष्य की ओर

भेद तम रास्तों के
दिया उम्मीद का जला
देखें जो सपने
हकीकत में दिखेंगे वो नींदों को तोड़
बढ चलो तुम पथिक  लक्ष्य की ओर

चुभे हुए कंटकों के
पीर को परास्त कर
जय गीत तान छेड़
पथ में जो मिले पथिक उन्हें भी साथ जोड़
बढ़ चलो तुम पथिक  लक्ष्य की ओर

पंक में कमल खिले
कंटकों में गुलाब
प्रेरणा  लेकर उनसे
चलो सभी बाधाओं के भय को छोड़
बढ़ चलो तुम पथिक लक्ष्य की ओर

स्वप्न को स्वछन्द कर
हौसले बुलंद .कर
तोड़ बेडियों को दो
विजय की तरफ दो अपने कदमों को मोड
बढ़ चलो तुम पथिक लक्ष्य की ओर
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© copyright @ Kiran singh

कोशिश

*** कोशिश***

एक दीप जलाने की
कोशिश तो कर 
मिट जाएगा अंधेरा
मत डर , मत डर
  मत डर
सफर तय करने का
साहस तो कर 
मंजिल मिल जाएगा 
सब्र कर  , सब्र कर 
सब्र कर
सच की आवाज को
बुलंद तो कर 
झूठ मिट जाएगा
बहुत जल्द,  बहुत जल्द 
  बहुत जल्द
आत्मा की आवाज को 
कभी सुना तो कर 
हल हो जाएगा 
हर प्रश्न, हर प्रश्न
हर प्रश्न
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Monday, 15 September 2014

चाहा था

चाहा था मैंने भी पथ में
°°°°°°°°°°°°°°°°°°
चाहा था मैंने भी पथ मे 
साथ तुम्हारे .....आना 
तुम थे अपने सत्ता मद में
कर दिया नया ..बहाना 

पहना कर पायल की बेड़ी
कंगन की हथकड़ियाँ
ओढा दिया सस्कृति का चूनर
मुझे कैद ...कर लिया

मैं भी मूर्खा... जो ठहरी
स्वीकृति किया नीयति को
मुस्कुराते बढ .चली और
बदल दिया था लक्ष्य को

हे न्यायाधीश अब न्याय करो
निभाया है सातों वचन
किया आत्म मंथन और
गढ़ा काव्य एक सुन्दर

© copyright @ Kiran singh

Thursday, 11 September 2014

देखो सखि


देखो सखि ऋतु राज आ गया 

हमें नया अंदाज़ आ गया

धरा पहन ली पीली चूनर 

रूप देखकर नाज़ आ गया 


कोयल कूके फाग आ गया 

गीतों मे अनुराग आ गया  

 झनक उठी वीणा सी प्रकृति 

स्वर को अनुपम राग आ गया  


उमड़ हृदय में प्यार आ गया 

मुट्ठी में .संसार आ गया

वर्ण अक्षर छन्दों में सज गए

फिर लिखना शृंगार आ गया


मन में नव उल्लास आ गया 

नव विचार कुछ खास आ गया 

लिख दी मैंने ग़ज़ल - गीत फिर, 

लक्ष्य हमारे पास आ गया


©किरण सिंह

मैं पथिक

मैं पथिक

मैं पथिक
जीवन पथ का
थक गया
चलते
चलते

रणवीर था मैं
रण क्षेत्र का
हार गया
लडते
लडते

आंखें मेरी
बंद हो रही
थककर
जागते
जागते

सुख की शैय्या
बिछी हुई है
जाता हूँ
मनभर
सोने

कहां जा रह
कब आऊँगा
पता मुझे
खुद
पता नहीं

माफ कर देना
बन्धु बान्धव
जन
मेरा कोई
खता नहीं................किरण सिंह


मोम

!! तृप्त हूँ मैं जलकर भी !!

तृप्त हूँ मैं जलकर ...भी 
नहीं कामना कंचन ..की
भंग निशा नीरवता का कर 
टिमटिमाती मद्धम ..सी 

सन्तुष्ट हूं निज.जीवन...से
निखर गई मैं ...कुन्दन सी
खुशियाँ आती जाती रहती 
तितलियो सी उपवन .की

मुझ विरहन को जलने भी दो
यही नीयति इस जीवन की
बह जाने दो अश्रु नयन के
मैं मोम हूँ.......दीपक की 

नारी तुम भी तो जलती हो
इन दीपक की... बाती सी
तुमसे है घर आंगन रौशन
पावन तुम... गंगाजल सी

बेटी बहन पत्नी .माँ बन
आती छनकाती पायल सी
लिखती हो नित नई कहानी
विरह विरहन की पाती सी

.....( किरण सिंह ).....

Tuesday, 9 September 2014

समय

क्या समय तू कभी थकता नहीं है ?

शीत लहरी हो
या जेठ की दोपहरी
बेफिक्र तेरे चक्र ...का
निरन्तरता रुकता नहीं है 
क्या समय तू कभी थकता नहीं है ?

क्यों रुक गया है कोई
तेरे साथ चलते चलते
ठहर कर हाल पूछने को
तेरा दिल करता नहीं है  ?
क्या समय तू कभी थकता नहीं है ?

जीवन पथ लम्बा है
लक्ष्य तक पहुँचना है
हर पथिक को पहुँचाना क्या
तेरा दाइत्व नहीं है  ?
क्या समय तू कभी थकता नहीं है   ?

परिवर्तन ही तेरा
अबतक नीयत रहा है
सबकी अंकित स्मॄतियां
क्या तुझे विचलित करता नहीं है   ?
क्या समय तू कभी थकता नहीं है   ?.

बैठे कभी थे तख्तों पर
वो सड़कों पर उतर आए
उनका ये हाल तेरे हॄदय को
क्या द्रवित करता नहीं है   ?
क्या समय तू कभी थकता नहीं है    ?..................किरण सिंह

Monday, 8 September 2014

मुस्कानों में छुपी

!!! मुस्कानों में छुपी !!!

मुस्कानो में ...छुपी हुई
वेदना को व्यक्त कर दूँ 
भावनाओं को पिरोकर 
छन्द में अभिव्यक्त कर दूँ 

चेतना जड़ में जगाकर 
संवेदना ..स्पंद कर दूँ 
सृष्टि के ...सौन्दर्य को 
शब्द में अनुबंध कर दूँ 

मूक हॄदय में पीर रूके हैं
सस्वर उसे सशक्त कर दूं
मुस्कानों में .....छुपी हुई
वेदना को ...व्यक्त कर दूं

( किरण सिंह )

Friday, 5 September 2014

!!!!! चिट्ठी !!!!!

!!!!!! चिट्ठी !!!!!!

कितनी प्रतीक्षा रहती थी
उन दिनों
चिट्ठियों की
जब हर आहट पर
खोलते थे
द्वार
और डाकिया
थमा देता
किसी का
तार
तब कितना
मन होता
उदास
तब
कौवों को उचारते थे
बार बार
करते थे उनके
पाती का
इन्तज़ार
हर पत्र सपने गढते
रोज नए
जीवन के
सुखद एहसासों के
चांद तारो संग बातें करते
बीतते
अनगिनत
रातें
जाने कितनी
बार
अब कहां गए वो
दिन
चिट्ठियों के.................किरण सिंह

Thursday, 4 September 2014

जैसे ही

!!!!जैसे ही!!!!

जैसे ही नैहर की
चौकठ पर
रखा पांव
बड़े नेह से भौजाई
लिए खड़ी हांथो में
थाल
सजाकर
जुड़ा हमारा
हॄदय
खुशी से आया
नयन भर
हमने
दिया आषीश
मन भर
सजा रहे भाई का
आंगन
भरा रहे भाभी का
आँचल
रहे अखंड
सौभाग्य
हमारा
नैहर रहे
आबाद...............किरण सिंह

नित्य नई मैं

नित्य नई मैं

नित्य नई मैं
विषय बनूंगी
लिखो
काव्य
मैं वेदना
हूँ

सात सुरो में
राग जिन्दगी
छेडो
तान
मैं वन्दना
हूँ

सरल सुन्दर
जीवन पथ पर
बढे
चलो
मैं प्रेरणा
हूँ

तुमसे मैं हूँ
मुझसे तुम हो
पूर्ण हो
तुम
मैं अन्नपूर्णा
हूँ

चाह यही
उर में बस जाऊँ
करो
प्रेम
मैं प्रेम लता
हूँ

करो तपस्या
शांति स्थापना
करूंगी मैं
तेरी
साधना
हूँ

नील गगन में
चलो उड़ चले
डरो नहीं
मैं हौसला
हूँ

रंग हीन जो
चित्र दिखेंगे
भरो
रंग
मैं चित्रकला
हूँ

सॄष्टि का हम
सर्जन कर दें
तुम
पुरूष
मैं प्रकृति धरा
हूँ.................... किरण सिंह

Wednesday, 3 September 2014

जीवन के गीतों में

जीवन के गीतों के
आरोहों और अवरोहों में
मेरा समर्पण
पकड़
चल रही सांसों की
सरगम
निरन्तर

तुम्हारे मन्द्र सप्तक के
सात स्वर
मेरे तार सप्तक के स्वरों से
मिलकर
मध्य सप्तक को पकड़
गढ़ जाते हैं राग एक
सुन्दर

खनक कंगन
छनक पायल
तोड़ तुम्हारे नींद निशा में
भर श्रॄंगार रस
लिखा काव्य
मन से गढ़
सुन्दर

कुछ तुम कहकर
कुछ हम सहकार
प्रेम का समन्वय यह
जीवन
चल रहा है
बहती सरिता सी
छल छल
निर्मल
सुन्दर...............किरण सिंह

Monday, 1 September 2014

बिदाई की घडियां

!!!!!!!!!!! बिदाई की घडियाँ!!!!! !!!!

जब भी याद आती  बिदाई की. घड़ियाँ
आज भी भर आती है आंसू से अखियाँ

बड़े लाड़ से माँ ने ....मुझको सजाकर
डोली में बिठाया ज्यों रबर की गुड़िया

पिता के रूंधे से स्वर .....आषीश देते
अश्रुधारा लिए माँ की ममता की लडियां

जहां खेलकर बढ़ा ......बचपन हमारा
लुकाछिपी खेलती ढूंढे सखी सहेलियाँ

वो आंगन हमारा .......लिए अश्रुधारा
बिदा कर दिया छूटा. नैहर की गलियां

डाली से टूटी ज्यों .फूलों की कलियाँ
पीहर को चली सच ..पराई हैं बेटियाँ

वो लड़ाना झगड़ना तुम्हारे संग बहना
अब लागे है ज्यों ..थी नेह की बतिया

आज भी खीचते हैं... वो नेह की डोरी
जो बांधा था मैंने .वो भैया की रखिया........किरण सिंह

सिर्फ

!!!! सिर्फ !!!!

सिर्फ
उसकी आँखें
कह रही थी
जिसे वो
मुस्कुरा कर
अश्रुओं को पलको में
बंद कर
छुपाने की नाकाम
कोशिशें
कर रही थी
जब वो
पीहर से लौटी थी
नैहर
कहां हो पाते हैं पूरे
सबके स्वप्न
जो देखते हैं नयन
शायद
यही कहना चाहती थी
वो पर
कह न सकी
क्यों कि
सम्मान  जो बचाना था उसे
नैहर और
पीहर का
इसलिए सहा उसने
सौत का भी दंश
झेला उसने
हारती कैसे वो
बोया था उसकी माँ ने जो बीज
शहन शक्ति की
आखिर
हिम्मत के दम पर
दुखों से लडकर
अकेली
खिल ही गई वो
पंक में
कमल सी , कंटकों में
गुलाब सी
वो..........................किरण सिंह