Monday, 15 September 2014

चाहा था

चाहा था मैंने भी पथ में
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चाहा था मैंने भी पथ मे 
साथ तुम्हारे .....आना 
तुम थे अपने सत्ता मद में
कर दिया नया ..बहाना 

पहना कर पायल की बेड़ी
कंगन की हथकड़ियाँ
ओढा दिया सस्कृति का चूनर
मुझे कैद ...कर लिया

मैं भी मूर्खा... जो ठहरी
स्वीकृति किया नीयति को
मुस्कुराते बढ .चली और
बदल दिया था लक्ष्य को

हे न्यायाधीश अब न्याय करो
निभाया है सातों वचन
किया आत्म मंथन और
गढ़ा काव्य एक सुन्दर

© copyright @ Kiran singh

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