Thursday, 4 September 2014

नित्य नई मैं

नित्य नई मैं

नित्य नई मैं
विषय बनूंगी
लिखो
काव्य
मैं वेदना
हूँ

सात सुरो में
राग जिन्दगी
छेडो
तान
मैं वन्दना
हूँ

सरल सुन्दर
जीवन पथ पर
बढे
चलो
मैं प्रेरणा
हूँ

तुमसे मैं हूँ
मुझसे तुम हो
पूर्ण हो
तुम
मैं अन्नपूर्णा
हूँ

चाह यही
उर में बस जाऊँ
करो
प्रेम
मैं प्रेम लता
हूँ

करो तपस्या
शांति स्थापना
करूंगी मैं
तेरी
साधना
हूँ

नील गगन में
चलो उड़ चले
डरो नहीं
मैं हौसला
हूँ

रंग हीन जो
चित्र दिखेंगे
भरो
रंग
मैं चित्रकला
हूँ

सॄष्टि का हम
सर्जन कर दें
तुम
पुरूष
मैं प्रकृति धरा
हूँ.................... किरण सिंह

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