Thursday, 11 September 2014

मोम

!! तृप्त हूँ मैं जलकर भी !!

तृप्त हूँ मैं जलकर ...भी 
नहीं कामना कंचन ..की
भंग निशा नीरवता का कर 
टिमटिमाती मद्धम ..सी 

सन्तुष्ट हूं निज.जीवन...से
निखर गई मैं ...कुन्दन सी
खुशियाँ आती जाती रहती 
तितलियो सी उपवन .की

मुझ विरहन को जलने भी दो
यही नीयति इस जीवन की
बह जाने दो अश्रु नयन के
मैं मोम हूँ.......दीपक की 

नारी तुम भी तो जलती हो
इन दीपक की... बाती सी
तुमसे है घर आंगन रौशन
पावन तुम... गंगाजल सी

बेटी बहन पत्नी .माँ बन
आती छनकाती पायल सी
लिखती हो नित नई कहानी
विरह विरहन की पाती सी

.....( किरण सिंह ).....

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