!!!!!! चिट्ठी !!!!!!
कितनी प्रतीक्षा रहती थी
उन दिनों
चिट्ठियों की
जब हर आहट पर
खोलते थे
द्वार
और डाकिया
थमा देता
किसी का
तार
तब कितना
मन होता
उदास
तब
कौवों को उचारते थे
बार बार
करते थे उनके
पाती का
इन्तज़ार
हर पत्र सपने गढते
रोज नए
जीवन के
सुखद एहसासों के
चांद तारो संग बातें करते
बीतते
अनगिनत
रातें
जाने कितनी
बार
अब कहां गए वो
दिन
चिट्ठियों के.................किरण सिंह
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