निन्दक तेरा स्वागत है
त्रुटि कहाँ था कहाँ पता था
स्वयं ही स्वयं छला था
आत्म को अन्तरात्मा से करवाता मिलन है
निन्दक तेरा स्वागत है
प्रशंसा में क्या रखा है
बस जरा उत्साह बढ़ा है
बचा खुचा अभिमान तोड़ तू दिखलाता दर्पण है
निन्दक तेरा स्वागत है
मुझको ही मुझसे मिलवाता
स्वयं गिरकर है मुझे उठाता
स्वयं ईर्ष्या अग्नि में जलकर तू दमकाता मेरा मन है
निन्दक तेरा स्वागत है
झूठ कहे वो निन्दक है
सत्य कहे वो शुभचिंतक है
कलुषित अपना मन कर खुद ही
करता खुद से ही खुद छल है
निन्दक तेरा स्वागत है
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© copyright @ Kiran singh
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