Wednesday, 17 September 2014

निन्दक तेरा स्वागत है

निन्दक तेरा स्वागत है 

त्रुटि कहाँ था कहाँ  पता था 
स्वयं ही स्वयं छला था 
आत्म को अन्तरात्मा से करवाता मिलन है 
निन्दक तेरा स्वागत है 

प्रशंसा में क्या रखा है
बस जरा उत्साह बढ़ा है
बचा खुचा अभिमान तोड़ तू दिखलाता दर्पण है 
निन्दक तेरा स्वागत है 

मुझको ही मुझसे मिलवाता 
स्वयं गिरकर है मुझे उठाता 
स्वयं ईर्ष्या अग्नि में जलकर तू दमकाता मेरा मन है 
निन्दक तेरा स्वागत है

झूठ कहे वो निन्दक है
सत्य कहे वो शुभचिंतक है
कलुषित अपना मन कर खुद ही
करता खुद से ही खुद छल है

निन्दक तेरा स्वागत है 
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© copyright @ Kiran singh

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