!!!!!!!!!!! बिदाई की घडियाँ!!!!! !!!!
जब भी याद आती बिदाई की. घड़ियाँ
आज भी भर आती है आंसू से अखियाँ
बड़े लाड़ से माँ ने ....मुझको सजाकर
डोली में बिठाया ज्यों रबर की गुड़िया
पिता के रूंधे से स्वर .....आषीश देते
अश्रुधारा लिए माँ की ममता की लडियां
जहां खेलकर बढ़ा ......बचपन हमारा
लुकाछिपी खेलती ढूंढे सखी सहेलियाँ
वो आंगन हमारा .......लिए अश्रुधारा
बिदा कर दिया छूटा. नैहर की गलियां
डाली से टूटी ज्यों .फूलों की कलियाँ
पीहर को चली सच ..पराई हैं बेटियाँ
वो लड़ाना झगड़ना तुम्हारे संग बहना
अब लागे है ज्यों ..थी नेह की बतिया
आज भी खीचते हैं... वो नेह की डोरी
जो बांधा था मैंने .वो भैया की रखिया........किरण सिंह
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