कितना भी करे कोई छल
कितना भी करे कोई छल
तय करती चली मै सफ़र
बढी खुशियों की सौगात देकर
खुद रखा मैंने गम कुछ बचाकर
क्यूँ गिला भी हो मुझको किसी से
खुश हूँ आदत से मजबूर होकर
जिन्दगी को मैं रौशन करूँगी
चाहे बह जाए मोम पिघलकर
गूथ दूंगी मैं पुष्पो की माला
मुरझाने न पाएं वो खिलकर
हार भी मान लूँ मैं कैसे
जीतने की जो आदत है अबतक
मुझे आता है आँसू को पीना
इस लिए चल पड़ी मुस्कुराकर
© copyright Kiran singh
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