सब माधुर्य तुम्हारे हैं
मैं मैं नहीं तुम, तुम नहीं
अगर एक बन जाते हैं
पलक मूंद आँखों अपने
सपने नवल सजाते हैं
भले रहे उसपार तुम मगर
लहरे आती - जाती है
छू - छू कर मुझको मुझसे
कुछ - कुछ बातें बतलाती हैं
फिर हम तट पर बैठ रेत का
सुन्दर महल बनाते हैं
स्मृतियों की कल्पित कलियाँ
चुनकर स्वयं सजाते हैं
स्वप्न लोक में ही हम दोनों
मिलकर सेज सजाते हैं
एक दूजे में सिमट स्नेह से
सच्ची बात बताते हैं
अनायास स्वयं स्वर मुखरित
कहते भाव हमारे हैं
कविताकार हूं. मैं कविता के
सब माधुर्य तुम्हारे हैं
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