Thursday, 18 September 2014

माना मैने

!!!!! माना मैंने !!!!!!

माना मैंने छलावा था वो 
मूक मेरा रह जाना 
अन्तर्मुखी प्रकृति जो थी  
मुश्किल था कह पाना 

नयन सत्य कह दे न कहीं
पलकों में अश्रु सम्हाला
होठों पर मुस्कान लिए मैं 
निज नीयति को स्वीकारा

उस पार नदी के तुम चले 
इस पार नदी के मै बैठी 
लहरों से हाल तुम्हारा 
हरदम ही पूछा करतीं 

फिर तेरी स्मृतियों को मैंने
पलकों मे बंद कर डाला 
मन के भावों को पन्नों पर 
शब्दों मे लिख डाला 
……………………………………………
© copyright @ Kiran singh

No comments:

Post a Comment