Thursday, 11 September 2014

देखो सखि


देखो सखि ऋतु राज आ गया 

हमें नया अंदाज़ आ गया

धरा पहन ली पीली चूनर 

रूप देखकर नाज़ आ गया 


कोयल कूके फाग आ गया 

गीतों मे अनुराग आ गया  

 झनक उठी वीणा सी प्रकृति 

स्वर को अनुपम राग आ गया  


उमड़ हृदय में प्यार आ गया 

मुट्ठी में .संसार आ गया

वर्ण अक्षर छन्दों में सज गए

फिर लिखना शृंगार आ गया


मन में नव उल्लास आ गया 

नव विचार कुछ खास आ गया 

लिख दी मैंने ग़ज़ल - गीत फिर, 

लक्ष्य हमारे पास आ गया


©किरण सिंह

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