Thursday, 11 September 2014

मैं पथिक

मैं पथिक

मैं पथिक
जीवन पथ का
थक गया
चलते
चलते

रणवीर था मैं
रण क्षेत्र का
हार गया
लडते
लडते

आंखें मेरी
बंद हो रही
थककर
जागते
जागते

सुख की शैय्या
बिछी हुई है
जाता हूँ
मनभर
सोने

कहां जा रह
कब आऊँगा
पता मुझे
खुद
पता नहीं

माफ कर देना
बन्धु बान्धव
जन
मेरा कोई
खता नहीं................किरण सिंह


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