मैं पथिक
मैं पथिक
जीवन पथ का
थक गया
चलते
चलते
रणवीर था मैं
रण क्षेत्र का
हार गया
लडते
लडते
आंखें मेरी
बंद हो रही
थककर
जागते
जागते
सुख की शैय्या
बिछी हुई है
जाता हूँ
मनभर
सोने
कहां जा रह
कब आऊँगा
पता मुझे
खुद
पता नहीं
माफ कर देना
बन्धु बान्धव
जन
मेरा कोई
खता नहीं................किरण सिंह
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