क्या समय तू कभी थकता नहीं है ?
शीत लहरी हो
या जेठ की दोपहरी
बेफिक्र तेरे चक्र ...का
निरन्तरता रुकता नहीं है
क्या समय तू कभी थकता नहीं है ?
क्यों रुक गया है कोई
तेरे साथ चलते चलते
ठहर कर हाल पूछने को
तेरा दिल करता नहीं है ?
क्या समय तू कभी थकता नहीं है ?
जीवन पथ लम्बा है
लक्ष्य तक पहुँचना है
हर पथिक को पहुँचाना क्या
तेरा दाइत्व नहीं है ?
क्या समय तू कभी थकता नहीं है ?
परिवर्तन ही तेरा
अबतक नीयत रहा है
सबकी अंकित स्मॄतियां
क्या तुझे विचलित करता नहीं है ?
क्या समय तू कभी थकता नहीं है ?.
बैठे कभी थे तख्तों पर
वो सड़कों पर उतर आए
उनका ये हाल तेरे हॄदय को
क्या द्रवित करता नहीं है ?
क्या समय तू कभी थकता नहीं है ?..................किरण सिंह
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