Tuesday, 9 September 2014

समय

क्या समय तू कभी थकता नहीं है ?

शीत लहरी हो
या जेठ की दोपहरी
बेफिक्र तेरे चक्र ...का
निरन्तरता रुकता नहीं है 
क्या समय तू कभी थकता नहीं है ?

क्यों रुक गया है कोई
तेरे साथ चलते चलते
ठहर कर हाल पूछने को
तेरा दिल करता नहीं है  ?
क्या समय तू कभी थकता नहीं है ?

जीवन पथ लम्बा है
लक्ष्य तक पहुँचना है
हर पथिक को पहुँचाना क्या
तेरा दाइत्व नहीं है  ?
क्या समय तू कभी थकता नहीं है   ?

परिवर्तन ही तेरा
अबतक नीयत रहा है
सबकी अंकित स्मॄतियां
क्या तुझे विचलित करता नहीं है   ?
क्या समय तू कभी थकता नहीं है   ?.

बैठे कभी थे तख्तों पर
वो सड़कों पर उतर आए
उनका ये हाल तेरे हॄदय को
क्या द्रवित करता नहीं है   ?
क्या समय तू कभी थकता नहीं है    ?..................किरण सिंह

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