!!! जिन्दगी !!!!
प्रवाह में बहती
रुकतीं , ठिठकती
ठहरती
और फिर
बहती
जिन्दगी
तू
नीर है
अनेकों बार
हारकर
और फिर
हारी हुए
बाजी को
जीतती
जिन्दगी
तू
वीर है
कितनी बार
देती है खुशी
और खभी
खुशी देते देते
दे जाती है
दर्द भी
साथ
जिन्दगी
तू
पीर है
पोषण है तू
जीव जगत का
कर्म करो
वर्ना
फटी दूध सी
फेकी जाओगी
जिन्दगी
तू
क्षीर है
अपनी मर्जी से
बिना बताए
निकल जाती है
तरकश से
फिर कभी
वापस
नहीं
आने के लिए
जिन्दगी
तू
तीर है
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© copyright Kiran singh
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