Monday, 1 September 2014

सिर्फ

!!!! सिर्फ !!!!

सिर्फ
उसकी आँखें
कह रही थी
जिसे वो
मुस्कुरा कर
अश्रुओं को पलको में
बंद कर
छुपाने की नाकाम
कोशिशें
कर रही थी
जब वो
पीहर से लौटी थी
नैहर
कहां हो पाते हैं पूरे
सबके स्वप्न
जो देखते हैं नयन
शायद
यही कहना चाहती थी
वो पर
कह न सकी
क्यों कि
सम्मान  जो बचाना था उसे
नैहर और
पीहर का
इसलिए सहा उसने
सौत का भी दंश
झेला उसने
हारती कैसे वो
बोया था उसकी माँ ने जो बीज
शहन शक्ति की
आखिर
हिम्मत के दम पर
दुखों से लडकर
अकेली
खिल ही गई वो
पंक में
कमल सी , कंटकों में
गुलाब सी
वो..........................किरण सिंह

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